Sunday, 10 February 2019

તાડ નાં ફળ નાં ફાયદા

તાડ ના જંગલી ફળ - ફાયદા જાણીને દંગ રહી જશો.

ગરમીના વધતા તાપમાન થી રાહત મેળવવા અને શરીરની ઉણપને દુર કરવા માટે ગરમીમાં ખાવા માટે ઘણા એવા ફળ હોય છે જે આપણા શરીર માટે ખુબ જ જરૂરી ગણાય છે. એટલા માટે આ ફળને આઈસ એપલના નામથી પણ ઓળખવા માં આવે છે. આ ફળના વૃક્ષનું નામ તાડનું વૃક્ષ છે. તો ચાલો જાણીએ આ ફળના ફાયદા વિશે.
તાડના વૃક્ષનું ફળ બીજા ફળ સમાન જ શરીરને તદુરસ્ત રાખે છે એ ઘણી બીમારીઓ માંથી રાહત આપવા માં કામ કરે છે. જેનાથી શરીરને એનર્જી મળે છે. તાડના વૃક્ષના ફળનો સ્વાદ નારીયેલ  ના ફળની સમાન હોય છે. તો ચાલો તાડના વૃક્ષ સાથે સંકળાયેલા ફાયદા વિશે જાણકારી જાણીએ. તાડનું ફળ એ લોકો માટે એક સારો વિકલ્પ છે જે પર્યાપ્ત આહાર લઇ શકતા નથી. આ બાળકો અને વયસ્કોમાં કુપોષણને પણ રોકે છે.
સવારે તાજા તાડીનો ઉપયોગ દવાના રૂપમાં કરવામાં આવે છે. એનું સેવન પેટની બીમારીઓ દુર કરે છે. આ પથરીને ગળવાનું કામ કરે છે. અથવા કિડનીની બીમારીઓમાં પણ લાભદાયક બને છે.
આ ફળનો ઉપયોગ શરીરની તાકાત વધારવા માટે પણ કરવામાં આવે છે. ખેતર માં પરિશ્રમ કરતા ખેડૂતોનું આ ફળ મુખ્ય ફળો માંથી એક છે આ ફળને એ લોકો ખાધ્યા પછી જુન જુલાઈ મહિનામાં આખો દિવસ ખેતરમાં કામ કરી શકે છે. જો આ ફળનું તમે સેવન કરો છો તો તમારામાં એનર્જીની ઉણપ રહેશે નહિ અને તમારું શરીર ખુબ જ તાકાત વાળું રહે છે.તાડના વૃક્ષના ફળમાં ઘણા પ્રમાણમાં પોટેશિયમ રહેલુ હોય છે, જે શરીર ની અંદરની ગંદકીને સાફ કરીને લીવરને સુરક્ષિત રાખવામાં દદ કરે છે. આ શરીરની અંદર ના ઝેરીલા પદાર્થને બહાર કાઢવામાં મદદ કરે છે, જેનાથી શરીરના ઘણા પ્રકાર ના રોગો પણ દુર થઇ જાય છે. આ ફળનું સેવન કરવાથી ખુબ જ ફાયદો થાય છે.

Tuesday, 5 February 2019

रामफल - केंसर पर रामबाण इलाज

कीमोथेरेपी से है 10 हज़ार गुना अधिक प्रभावशाली माना जाता है "रामफल"

ग्रेविओला जिसे हिंदी में रामफल कहते है, ज्यादातर अफ्रीका , दक्षिण अमेरिका और दक्षिणपूर्व एशिया के बरसाती जंगलों में पाया जाता है. कुछ साल पहले जब इसके बारे में नए रिसर्च किये गए तो पता चला की इसके रस में कई ऐसे तत्व होते है जो कैंसर का इलाज करने में काम आ सकता है. यह तत्व यकृत और स्तन कैंसर के कीटाणुओं को मारने की क्षमता रखतें है.यह शरीफे की तरह दिखने वाला फल भारत के कई इलाकों में भी मिलता है जैसे हैदराबाद जो तेलंगाना की राजधानी है. यहाँ की भाषा “तेलुगु” में भी इसे रामफल ही कहतें हैं. क्या रामफल सचमुच कैंसर को मारने की क्षमता रखता है. चलिये देखते है की इस खट्टे फल की क्या क्या खास बातें है और ये कैसे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है ।
ग्रेविओला या रामफल मिलता कहाँ है ?
रामफल का पेड़ एक सदाबहार पेड़ है जो क्यूबा, मध्य अमेरिका, मैक्सिको, कोलंबिया, ब्राजील, पेरू, वेनेजुएला और अन्य अमेज़न के वर्षावन क्षेत्रों में पाया जाता है. यह फल लाखों कैंसर के रोगियों के लोगों के साथ-साथ उनके डॉक्टरों के लिए आशा की एक किरण के रूप में आता है। इसका वैज्ञानिक नाम एनोना मुरिकाता है, और इस फल को कैंसर के प्राकृतिक इलाज के रूप में पूरे समुदाय के लिए एक भगवान का उपहार माना जा सकता है। वैसे कई परिक्षण किए गए हैं लेकिन इसे कैंसर के लिए एक सिद्ध उपचार के रूप में घोषित करने से पहले बहुत और परिक्षण करने की जरूरत है. अभी तक के रिसर्च से ये माना जा रहा है के ये फल कैंसर के इलाज़ में काफी कारगर हो सकता है। ग्रेविओला , पत्ते, पाउडर, कैप्सूल के रूप में और यहां तक कि तरल रूपों में विभिन्न रूपों में उपलब्ध है ।
ग्रेविओला- एक फल अलग-अलग नाम-ग्रेविओला के समानार्थी शब्द
स्पेनिश लोग इसे “गुआनबाणा ” फल कहते हैं। पुर्तगाली “ग्रेविओला ” कहते हैं। ब्राजीलियाई ऐसे गंदा, गुयाबानो, करोसोलिएर , गुआनावाना , टोगे बांरेिसि , डूरियन बंगला , नंगका ब्लॉन्डा , सिर्सक , और नंगका लोंडा के रूप में अलग-अलग नामों से बुलाते हैं । दक्षिण भारतीय राज्य केरल में, यह बस कांटों के साथ शरीफा,या “मुल्लथा ” के रूप में जाना जाता है। अन्य भारतीय क्षेत्रों में, यह शूल -राम-फल और हनुमान फल के रूप में जाना जाता है।यह बड़े फल आकार का एक खट्टा फल है । यह कच्चा खाया जाता है और इसके गूदे या रस का शर्बत तैयार करने में भी उपयोग हो सकता है. इस फल के कैंसर रोधक गुण उल्लेखनीय हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यह एक नियमित कीमोथेरेपी से दस हजार गुना अधिक प्रभावी हो सकता है।
ग्रेविओला के स्वास्थ्य लाभ और कुछ सामान्य गुण
Graviola Health Benefits In Hindi
इससे भी बड़ी बात ये है कि यह एक प्राकृतिक फलों का रस है, इसलिए किसी भी तरह का साइड इफ़ेक्ट नहीं होता ।
वैसे ग्रेविओला कई तरह के इलाज में उपयोग किया जाता है, यह मुखयतः अपने कैंसर विरोधी प्रभाव के लिए बहुत लोकप्रिय हो गया है ।
पेट के कीड़े और परजीवी इस फल से स्वाभाविक रूप से मारे जाते है
इसमें कोई शक नहीं कि ग्रेविओला कैंसर की रोकथाम का काम करता है
ग्रेविओला उच्च रक्तचाप के प्रबंधन और उपचार में भी प्रयोग किया जाता है
अपने एंटीबायोटिक या माइक्रोबियल विरोधी गुणों के कारण ग्रेविओला फंगल संक्रमण से लड़ने में अद्भुत काम करता है
तनाव, अवसाद और तंत्रिका संबंधी विकार से पीड़ित लोगों को इस फल लेने के बाद सकारात्मक परिणाम दिखाई दिए है
ग्रेविओला पेड़ कहीं भी आसानी से उगाया जा सकता है जैसे हैदराबाद और कई दूसरे जगहों पर ।

ग्रेविओला के औषधीय गुण
Medicinal Benefits Of Graviola In Hindi
इसकी पत्तियां कैंसर कोशिकाओं को मारने में समान रूप से प्रभावी हैं ।
यह कैंसर की कोशिकाओं को मारता है और एक प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में प्रभावी है ।
जो इस फल का उपयोग करता है, उसका समग्र दृष्टिकोण में सुधार आता हैं ।
यह पेड़ और इसके हिस्से कई घातक संक्रमण के खिलाफ काम करतें है ।
केमो चिकित्सा के विपरीत इससे वजन घटना, बालों का झरना और मतली जैसे में कोई साइड इफेक्ट नहीं है ।
चाहे उपचार कितने दिन भी चले , आप हमेशा मजबूत और स्वस्थ महसूस करते हैं ।
ग्रेविओला का रस एक प्रतिरक्षा प्रणाली बूस्टर और रक्षक का काम करता है ।
ग्रेविओला पेड़ के रस का लाभ
इसका रस पेट के कैंसर, स्तन कैंसर, प्रोस्ट्रेट कैंसर, अग्नाशय के कैंसर और फेफड़ों के कैंसर कोशिकाओं को मारता है कैंसर कोशिकाओं को मारने के क्रम में यह स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं करता है
ग्रेविओला के अन्य औषधीय उपयोग
ग्रेविओला पेड़ की छाल, जड़ और यहां तक कि फल के बीज विभिन्न स्वास्थ्य के मुद्दों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया गया है, जैसे :

खराब लिवर
दमा
दिल के रोग
गठिया और जोड़ों से संबंधित बीमारियों

Saturday, 12 January 2019

सूर्य नमस्कार प्रक्रिया इतिहास व फायदे

✍🏽  सूर्यनमस्काराची
              निर्मिती

रथसप्तमीबरोबर सूर्यनमस्काराचे महत्त्व कसे जोडले गेले आहे, तसेच सूर्योपासना आणि सूर्यनमस्काराच्या निर्मितीपासूनचे महत्त्व अभ्यासण्यासाठी केलेला हा लेखनप्रपंच-  

*सूर्यनमस्काराची निर्मिती*

माणसाने परमेश्वराला प्रथम पाहिले ते सूर्याच्या रूपात. माणसांत आणि एकंदर सजीव सृष्टीत जे चैतन्य आहे ते सूर्यापासून आले आहे असे  मानले जाते. परंतु या चैतन्यातून एकापेक्षा एक असे पराक्रम साकार करायचे असतील, तर सूर्योपासनेचे विशिष्ट असे शास्त्र तयार करायला हवे असे भारतातील ऋषींना वाटले. आणि त्यांनी केलेल्या चिंतनातून सूर्यनमस्कार जन्माला आले. यामुळे सूर्योपासना आणि सूर्यनमस्काराचे भारतीय संस्कृतीतील महत्त्व अनन्यसाधारण आहे.

*प्राचीन सूर्यमंदिरे व सूर्योपासना यांचे महत्त्व*

सूर्याला देवता मानले जाते. सूर्यनमस्काराबरोबरच सूर्यनमस्काराची उपासना गायत्री स्वरूपात किंवा सूर्यस्तुती, अशा कोणत्याही स्वरूपात सूर्योपासना केल्यास एकाग्रता साध्य होते. तसेच बुद्धी, स्मृती तीक्ष्ण होतात. शिवाय आकलनशक्तीही सुधारते.

      भारतात सूर्यमंदिरे फारच थोडी आहेत. सौराष्ट्रातील वेरावळ, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, नेपाळ, कोणार्क इ. ठिकाणी सूर्यमंदिरे आहेत. आपल्या महाराष्ट्रातील रत्नागिरी जिल्ह्यात राजापूर तालुक्यात कशेळी या गावी शेकडो वर्षांपासून असलेले हे सूर्यमंदिर मुख्य मार्गाकडून केवळ तीन ते चार किमीवर हे नितांत सुंदर देवस्थान वसलेले आहे.

       उगवत्या व मावळत्या् सूर्याला दंडवत घालणे हे सूर्यनमस्काराचे प्रमुख उद्दिष्ट आहे.

*सूर्यनमस्काराचे ऐतिहासिक महत्त्व*

सूर्यनमस्कारात वापरल्या जाणा-या  आसनांचा ऐतिहासिक ग्रंथात उल्लेख आढळतो. श्री समर्थ रामदास सूर्यनमस्काराचा वापर शरीरसौष्ठवासाठी करत असत.

सूर्यनमस्कार करताना म्हटले जाणारे मंत्र व त्यांचे महत्त्व

प्रत्येक सूर्यनमस्काराची सुरुवात करताना मंत्र म्हटले जातात. त्या प्रत्येक मंत्राचा संबंध शरीरातील चक्राशी आहे. –

  क्र.           मंत्र             आसन

१.     मित्राय नमः        अनाहत चक्र

२.     रवये नमः         विशुद्ध चक्र

३.     सूर्याय नमः       स्वाधिष्ठान चक्र

४.     भानवे नमः       आज्ञा चक्र

५.     खगाय नमः       विशुद्ध चक्र

६.     पुष्णे नमः        मणिपूर चक्र

७.     हिरण्यगर्भाय नमः   स्वाधिष्ठान चक्र

८.     मरीचये न मः      विशुद्ध चक्र

९.     आदित्याय नमः    आज्ञा चक्र

१०.     सवित्राय नमः      स्वाधिष्ठान चक्र

११.     अर्काय नमः       विशुद्ध चक्र

१२.     भास्कराय नमः    अनाहत चक्र

*सूर्यनमस्कार करताना सूर्याचीच नावे का म्हणावी ?*

   सूर्याला चराचर सृष्टीचा आत्मा मानले जाते. सकाळची सूर्यकिरणे अंगावर घेत प्रणवासहित त्याचे नामोच्चरण, दर्शन व सूर्यनमस्कार घालणे म्हणजे एकाचवेळी शारीरिक, मानसिक वा आध्यात्मिक शक्तिंचा विकास साधणे होय. सूर्यावाचून काहीच व्यवहार चालत नाही. मग अंधांना सूर्याचे दर्शन कसे घडावे? एवढे सूर्याला महत्त्व आहे.

*सूर्यनमस्कारामुळे होणारे लाभ*

सूर्यनमस्कारात आरोग्य, दीर्घायुष्य, कार्यक्षमता हेच ध्येय डोळ्यासमोर ठेवायचे असते. या आसनामुळे आयुष्य, बल आणि बुद्धिचा विकास होतो. मस्तक, मान, हात, पाय, छाती, पोट, कंबरेचे स्नायू, मेरूदंड, पायाची बोटे, गुढगे, सर्व सांधे यांना व्यायाम घडतो. तसेच पोटाचे जडत्व, अनावश्यक वाढलेला मेद, ओटीपोटातील चरबी, थायरॉईडसारखे विकार,  मुलांचे फिरलेले हातपाय व काही हाडांचे दोष, गंडमाळा, घशातील विकार नाहिेसे होतात. क्षयापासून संरक्षण मिळते, मनोबलाचा विकास होतो. शरीरात शुद्ध रक्ताचा सारख्या प्रमाणात संचार होतो.

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पान का पत्ता - एक वरदान

किसी समारोह में या घर पर भोजन के बाद, बेहतर पाचन और मुखवास के रूप में प्रयोग किया जाने वाला पान, केवल स्वाद की पुड़िया नहीं है, बल्कि इससे आपकी कई तरह की समस्याएं हल हो सकती हैं..जानिए किन समस्याओं में कारगर है पान का पत्ता –

1- एंटीसेप्टिक – पान का पत्ता एक एंटीसेप्टिक का काम करता है। छोटी-मोटी चोट या खरोंच आने पर, या मोच आने पर पान का पत्ता लपेटना, या उसे पीस कर लगाने से लाभ होता है ।
2 नकसीर – नकसीर या नाक से खून आने की समस्या में पान के पत्ते सूंघने से लाभ होता है, और खून आना बंद हो जाता है।
3 लाल आंखें- थकान, नींद न होना या फिर आंखों में किसी कारण से समस्या होने पर, जब आंखें लाल हो जाएं, तो पान के पत्ते उबालकर ठंडे किए गए पानी के छींटे आंखों पर मारें।
4 मोटी आवाज- आवाज मोटी होने की स्थति में पान खाना और उसका पानी पीना बेहद लाभदायक होता है। इससे आवाज भी ठीक होती है, अैर गले की समस्याएं भी खत्म हो जाती हैं।
5 मसूड़े – मसूड़ों में खून आने या अन्य तकलीफ होने पर, पान को उबालकर उसके पानी से गरारे करने से, मसूड़ों से खून का की समस्या में लाभ मि‍लता है।
6 ब्रोंकाईटिस – पान के 7 पत्ते को दो कप पानी में चीनी के साथ उबालें। जब यह पानी 1 गिलास रह जाए, तब इसे दिन में 3 बार पीने से ब्रोंकाईटिस में लाभ होता है।
7 कफ – पान के 15 पत्ते, तीन गिलास पानी में उबालें । जब यह पानी एक तिहाई रह जाए तो इसे दवा के रूप में दिन में 3 बार पिएं। इससे कफ निकलने में आसानी होगी।
8 शरीर की दुर्गंध – शरीर की दुर्गंध लगातार बने रहने पर, पान के 5 पत्ते, दो कप पानी में उबालकर इस पानी को दोपहर के वक्त पीने से लाभ मि‍लता है।
9 खुजली – शरीर में खुजली की समस्या होने पर, पान के पत्ते उबालकर उस पानी से नहाने से खुजली ठीक हो जाती है।
10 स्तनपान – स्तनपान कराते समय दर्द अैर सूजन के कारण परेशानी आ रही हो, तो पान के पत्तों पर नारियल का तेल लगाकर हल्का सा गर्म कर लें, और स्तनों के पास रखें। इससे सूजन कम होगी और स्तनपान में आसानी होगी।
11-बवासीर- दो दिन सिर्फ पान के पत्ते खाएं और इसके अलावा कुछ नहीं। 48 घंटे में बवासीर जड़ से खत्म हो जाएगी। अब तक कई लोग इस नुस्खे से ठीक हो चुके हैं।
तो आजमाएं यह वरदान अपने स्वास्थ्य के लिए ।

Sunday, 30 December 2018

मर्यादित "रम" एक फायदेमंद दारू

कैंसर-हार्टअटैक जैसी 10 बीमारियों से बचाती है रम..बस पीने का सही तरीका पता होना चाहिए-

रम पीने के फायदे बहुत सुनकर आपको थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन रम सिर्फ दारू नहीं दवा भी है। रम पीने से जहां इंसान को थोड़ा सुरूर मिलता है वहीं हमारी सेहत को सुकून भी। इसलिए आज हम आपको रम पीने के फायदे बताएंगे जिन्हें जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। दुनिया भर में सबसे ज्यादा पिया जाने वाला एल्कॉहल रम सेहत के लिए काफी फायदेमंद है।
क्या है रम : रम गन्ने के रस से बनती है जो मुख्य रूप से कैरीबियाई एल्कॉहल है। मध्य अमेरिका और मेक्सिको सहित कई अन्य क्षेत्रों में भी इसका उत्पादन किया जाता है। रम एक ग्लूटेन-फ्री एल्कोहल है स्वाद में मीठे के साथ थोड़ा कड़वी भी होती है। रम का स्वाद एक बारगी आपको थोड़ा फायर्ड यानि ज्वलनशील जैसा लगता है। रम पुरानी हो जाए तो यह हल्के भूरे और काले रंग में हो सकती है। रम का रंग ब्लड रेड या यलो होता। हालांकि रम का कोई सटीक इतिहास ज्ञात नहीं है लेकिन यह कैरिबियन में 500 से ज्यादा सालों से बड़े स्तर पर उत्पादित की जा रही है।
क्या आप जानते हैं रम पीने के फायदों के बारे में : रम का ब्रैंड ‘ओल्ड मॉन्क’ काफी चर्चित है। कपिल मोहन ने ‘ओल्ड मॉन्क’ रम को बनाया था और इस ब्रैंड ने दुनिया भर में धूम मचाई हुई है।कपिल मोहन ने 1954 में ‘ओल्ड मॉन्क’ रम को लॉन्च किया था। कपिल मोहन की मृत्यु 6 जनवरी, 2018 को हुई थी।
रम में एल्कोहल की मात्रा 40 से 60% तक होती है। रम वाइन के तौर पर तो पिया ही जाता है बल्कि यह कहीं-कहीं आम पेय भी है। जैसे कि रम और कोक बहुत लोकप्रिय हैं। रम अगर सही मात्रा में ली जाए तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती है। रम का अत्यधिक सेवन ही सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है वरना रम के फायदे आपको चौंका देंगे। मोहन ने भी रम के पीने फायदे बताकर लोगों को जागरूक किया था। डॉक्टर्स ने भी रम पीने के फायदे बताए हैं। डॉक्टरों के मुताबिक एक सही मात्रा में रम पीने के फायदे होते हैं। यह सेहत के लिए बहुत लाभदायक है साथ ही कुछ बीमारियों में दवा की तरह है। इसलिए अब आप जान जाइए रम सिर्फ शराब नहीं है।
रम पीने के फायदे यह भी हैं कि व्यक्ति जोड़ों के दर्द से निजात पाता है। हम आपको बता दें कि रम का सेवन बॉडी पेन और जोड़ों के दर्द को काफी कम करता है। रम पीने से मांसपेशियों में होने वाले दर्द से राहत मिलती है। खासतौर पर बुढ़ापे में रम का सेवन मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है। रम पीने के फायदे यह भी हैं कि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है जिससे बीमारियों का खतरा कम होता है। रम पीने से आपसे कुछ बीमारियां कोसों दूर भागती हैं। रम के जरूरी पोषक तत्व शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। परंतु इसके सेवन में मात्रा का ध्यान अवश्य रखें।
रम की तासीर गर्म होती है इसलिए यह शरीर को उर्जा के साथ गर्मी प्रदान करती है। रम पीने से शरीर में गर्माहट आती है। अगर कोई व्यक्ति अत्यधिक ठंड महसूस कर रहा हो तो वह रम का सेवन करें। सर्दियों में मौसम के तापमान से संतुलन बनाने के लिए रम पी लेना बेहतर होता है। रम के सेवन से शरीर को गर्माहट मिलती है।
रम पीने से मौसमी सर्दी-जुकाम बिल्कुल दूर रहता है। रम के सेवन से ठंड लगने की समस्या नहीं होती और सर्दी जुकाम ठीक हो जाता है। खासतौर पर सर्दियों में रम पीने से सर्दी-जुकाम जल्दी नहीं होता है।
रम पीने के फायदे में हम आपके सबसे पहले बता दें कि यह दिल को एकदम स्वस्थ रखती है। दिल की बीमारियों से दूर रहने के लिए रम लाभदायक है। हार्ट अटैक से लेकर कैंसर तक की बीमारियों का खतरा रम कम कर देती है। रम पीने के फायदे यह भी हैं कि इसके सेवन के तुरंत बाद से आपको अच्छी नींद आती है। बहुत से लोग बॉडी को रिलेक्स करने के लिए रम का सेवन करते हैं। रम में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिनसे व्यक्ति को अच्छी नींद आती है। गहरी नींद में सोने के बाद सुबह उठने पर आप तरोताजा फील करते हैं। रात को रम पीने से सोने में कोई परेशानी नहीं होती और बॉडी रिलेक्स हो जाती है।
रम के सेवन से डायबिटीज के लक्षण पहले ही दिख जाते हैं अगर आपको शुगर की समस्या हो तो रम इसको कम करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। इसके साथ ही रम गैलस्टोन (पित्ताशय की थैली) से जुड़ी समस्याएं दूर करती है।
रम के सेवन से मानसिक शांति मिलती है लेकिन इसका सेवन कम मात्रा में ही करें वरना एल्कॉहल के नशे से हंगामा भी हो सकता है। इसलिए हम आपको बता दें कि रम के सेवन से मानसिक रोग जैसे अल्जाइमर और पार्किंसन रोग में फायदा होता है। पार्किंसन रोग केंद्रिय तंत्रिका का एक रोग है जिसमें रोगी के शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। अगर किसी के शरीर के अंग कांपते हो तो उसे रम का सेवन करना चाहिए परंतु यह डॉक्टर की परामर्श अनुसार ही करें।

Thursday, 27 December 2018

मृत्यु के पश्च्यात आत्मा की गति

मृत्यु,के बाद क्या होता है,श्रीमदभगवत गीता?????

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे हैं,,,

अर्जुन पूछता है – हे त्रिलोकीनाथ! आप आवागमन अर्थात पुनर्जन्म के बारे में कह रहे हैं, इस सम्बन्ध में मेरा ज्ञान पूर्ण नहीं है। यदि आप पुनर्जन्म की व्याख्या करें तो कृपा होगी।

कृष्ण बताते हैं – इस सृष्टि के प्राणियों को मृत्यु के पश्चात् अपने-अपने कर्मों के अनुसार पहले तो उन्हें परलोक में जाकर कुछ समय बिताना होता है जहाँ वो पिछले जन्मों में किये हुए पुण्यकर्मों अथवा पापकर्म का फल भोगते हैं।

फिर जब उनके पुण्यों और पापों के अनुसार सुख दुःख को भोगने का हिसाब खत्म हो जाता है तब वो इस मृत्युलोक में फिर से जन्म लेते हैं। इस मृत्युलोक को कर्मलोक भी कहा जाता है। क्योंकि इसी लोक में प्राणी को वो कर्म करने का अधिकार है जिससे उसकी प्रारब्ध बनती है।

अर्जुन पूछते हैं – हे केशव! हमारी धरती को मृत्युलोक क्यों कहा जाता है?

कृष्ण बताते हैं – क्योंकि हे अर्जुन, केवल इसी धरती पर ही प्राणी जन्म और मृत्यु की पीड़ा सहते हैं।

अर्जुन पूछता है – अर्थात दूसरे लोकों में प्राणी का जन्म और मृत्यु नहीं होती?

कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! उन लोकों में न प्राणी का जन्म होता है और न मृत्यु। क्योंकि मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो न जन्म लेती है और न मरती है।

अर्जुन फिर पूछते हैं – तुमने तो ये भी कहा था कि आत्मा को सुख-दुःख भी नहीं होते। परन्तु अब ये कह रहे हो कि मृत्यु के पश्चात आत्मा को सुख भोगने के लिए स्वर्ग आदि में अथवा दुःख भोगने के लिए नरक आदि में जाना पड़ता है। तुम्हारा मतलब ये है कि आत्मा को केवल पृथ्वी पर ही सुख दुःख नहीं होते, स्वर्ग अथवा नरक में आत्मा को सुख या दुःख भोगने पड़ते हैं।

कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! आत्मा को कहीं, किसी भी स्थान पर या किसी काल में भी सुख दुःख छू नहीं सकते। क्योंकि आत्मा तो मुझ अविनाशी परमेश्वर का ही प्रकाश रूप है। हे अर्जुन! मैं माया के आधीन नहीं, बल्कि माया मेरे आधीन है और सुख दुःख तो माया की रचना है। इसलिए जब माया मुझे अपने घेरे में नहीं ले सकती तो माया के रचे हुए सुख और दुःख मुझे कैसे छू सकते हैं।
सुख दुःख तो केवल शरीर के भोग हैं, आत्मा के नहीं।

अर्जुन कहता है – हे केशव! लगता है कि तुम मुझे शब्दों के मायाजाल में भ्रमा रहे हो। मान लिया कि सुख दुःख केवल शरीर के भोग हैं, आत्मा इनसे अलिप्त है। फिर जो शरीर उनको भोगता है उसकी तो मृत्यु हो जाती है। वो शरीर तो आगे नहीं जाता, फिर स्वर्ग अथवा नरक में सुख दुःख को भोगने कौन जाता है?

अर्जुन पूछता है – जीव आत्मा? ये जीव आत्मा क्या है केशव!

कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! जीव आत्मा। देखो, जब किसी की मृत्यु होती है तो असल में ये जो बाहर का अस्थूल शरीर है केवल यही मरता है। इस अस्थूल शरीर के अंदर जो सूक्ष्म शरीर है वो नहीं मरता। वो सूक्ष्म शरीर आत्मा के प्रकाश को अपने साथ लिए मृत्युलोक से निकलकर दूसरे लोकों को चला जाता है। उसी सूक्ष्म शरीर को जीवात्मा कहते हैं।

अर्जुन पूछता है – इसका अर्थ है- जब आत्मा एक शरीर को छोड़कर जाती है तो साथ में जीवात्मा को भी ले जाती है?

कृष्ण कहते हैं – नहीं अर्जुन! ये व्याख्या इतनी सरल नहीं है। देखो, जैसे समुद्र के अंदर जल की एक बून्द समुद्र से अलग नहीं है उसी महासागर का एक हिस्सा है वो बून्द अपने आप सागर से बाहर नहीं जाती, हाँ! कोई उस जल की बून्द को बर्तन में भरकर ले जाये तो वो समुद्र से अलग दिखाई देती है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर रूपी जीवात्मा उस आत्म ज्योति के टुकड़े को अपने अंदर रखकर अपने साथ ले जाता है। यही जीवात्मा की यात्रा है जो एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक योनि से दूसरी योनि में विचरती रहती है।

इस शरीर में सुन अर्जुन एक सूक्ष्म शरीर समाये रे,
ज्योति रूप वही सूक्ष्म शरीर तो जीवात्मा कहलाये रे।
मृत्यु समय जब यह जीवात्मा तन को तज कर जाये रे,
धन दौलत और सगे सम्बन्धी कोई संग ना आये रे।
पाप पुण्य संस्कार वृत्तियाँ ऐसे संग ले जाए रे,
जैसे फूल से उसकी खुशबु पवन उड़ा ले जाए रे।
संग चले कर्मों का लेखा जैसे कर्म कमाए रे,
अगले जन्म में पिछले जन्म का आप हिसाब चुकाए रे।

हे अर्जुन! जीवात्मा जब एक शरीर को छोड़कर जाती है तो उसके साथ उसके पिछले शरीर की वृत्तियाँ, उसके संस्कार और उसके भले कर्मों का लेखा जोखा अर्थात उसकी प्रारब्ध सूक्ष्म रूप में साथ जाती है।

अर्जुन पूछते हैं – हे मधुसूदन! मनुष्य शरीर त्यागने के बाद जीवात्मा कहाँ जाता है?

कृष्ण कहते हैं – मानव शरीर त्यागने के बाद मनुष्य को अपने प्रारब्ध अनुसार अपने पापों और पुण्यों को भोगना पड़ता है। इसके लिए भोग योनियाँ बनी हैं जो दो प्रकार की हैं- उच्च योनियाँ और नीच योनियाँ।

स्वर्ग नर्क क्या है, श्रीमद भागवत गीता??????

एक पुण्य वाला मनुष्य का जीवात्मा उच्च योनियों में स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य भोगता है और पापी मनुष्य का जीवात्मा नीच योनियों में, नरक में रहकर अपने पापों को भोगता है। कभी ऐसा भी होता है कि कई प्राणी स्वर्ग नरक का सुख दुःख पृथ्वी लोक पर ही भोग लेते हैं।

अर्जुन पूछता है- इसी लोक में? वो कैसे?

कृष्ण कहते हैं – इसे तुम यूं समझों अर्जुन कि जैसे कोई सम्पन्न मनुष्य है, महल में रहता है, उसकी सेवा के लिए दास-दासियाँ हर समय खड़ी है, उसका एक इकलौता जवान बेटा है, जिसे वो संसार में सबसे अधिक प्रेम करता है और अपने आपको संसार का सबसे भाग्यशाली मनुष्य समझता है। परन्तु एक दिन उसका जवान बेटा किसी दुर्घटना में मारा जाता है।

दुखों का पहाड़ उस पर टूट पड़ता है। संसार की हर वस्तु उसके पास होने के बावजूद भी वो दुखी ही रहता है और मरते दम तक अपने पुत्र की मृत्यु की पीड़ा से मुक्त नहीं होता। तो पुत्र के जवान होने तक उस मनुष्य ने जो सुख भोगे हैं वो स्वर्ग के सुखों की भांति थे और पुत्र की मृत्यु के बाद उसने जो दुःख भोगे हैं वो नरक के दुखों से बढ़कर थे जो मनुष्य को इसी तरह, इसी संसार में रहकर भी अपने पिछले जन्मों के सुख दुःख को भोगना पड़ता है।

अर्जुन पूछता है – हे मधुसूदन! अब ये बताओ कि मनुष्य अपने पुण्यों को किन-किन योनियों में और कहाँ भोगता है?

कृष्ण बताते हैं – पुण्यवान मनुष्य अपने पुण्यों के द्वारा किन्नर, गन्धर्व अथवा देवताओं की योनियाँ धारण करके स्वर्ग लोक में तब तक रहता है जब तक उसके पुण्य क्षीण नहीं हो जाते।

अर्जुन पूछता है – अर्थात?

कृष्ण कहते हैं – अर्थात ये कि प्राणी के हिसाब में जितने पुण्य कर्म होते हैं उतनी ही देर तक उसे स्वर्ग में रखा जाता है। जब पुण्यों के फल की अवधि समाप्त हो जाती है तो उसे फिर पृथ्वीलोक में वापिस आना पड़ता है और मृत्युलोक में पुनर्जन्म धारण करना पड़ता है।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।

अर्थ :- वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानों(धनवान) के घर में जन्म लेता है।

अर्जुन पूछता है – परन्तु स्वर्ग लोक में मनुष्य के पुण्य क्यों समाप्त हो जाते हैं? वहाँ जब वो देव योनि में होता है तब वो अवश्य ही अच्छे कर्म करता होगा, उसे इन अच्छे कर्मों का पुण्य तो प्राप्त होता होगा?

कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! उच्च योनि में देवता बनकर प्राणी जो अच्छे कर्म करता है या नीच योनि में जाकर प्राणी जो क्रूर कर्म करता है, उन कर्मों का उसे कोई फल नहीं मिलता।
अर्जुन पूछता है – क्यों?

कृष्ण कहते हैं – क्योंकि वो सब भोग योनियाँ है। वहाँ प्राणी केवल अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगता है। इन योनियों में किये हुए कर्मों का पुण्य अथवा पाप उसे नहीं लगता। हे पार्थ! केवल मनुष्य की योनि में ही किये हुए कर्मों का पाप या पुण्य होता है क्योंकि यही एक कर्म योनि है।

पाप पुण्य का लेखा जोखा कैसे होता है?

अर्जुन पूछते हैं – इसका अर्थ ये हुआ यदि कोई पशु किसी की हत्या करे तो उसका पाप उसे नहीं लगेगा और यदि कोई मनुष्य किसी की अकारण हत्या करे तो पाप लगेगा? परन्तु ये अंतर क्यों?

कृष्ण कहते हैं – इसलिए कि पृथ्वी लोक में समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो विवेकशील है, वो अच्छे बुरे की पहचान रखता है। दूसरा कोई भी प्राणी ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए यदि सांप किसी मनुष्य को अकारण भी डस ले और वो मर जाये तो साप को उसकी हत्या का पाप नहीं लगेगा।

इसी कारण दूसरे जानवरों की हत्या करता है तो उसे उसका पाप नहीं लगता या बकरी का उदाहरण लो, बकरी किसी की हत्या नहीं करती, घास फूंस खाती है, इस कारण वो पुण्य की भागी नहीं बनती। पाप पुण्य का लेखा जोखा अर्थात प्रारब्ध केवल मनुष्य का बनता है। इसलिए जब मनुष्य अपने पाप और पुण्य भोग लेता है तो उसे फिर मनुष्य की योनि में भेज दिया जाता है।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।

एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना- गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
अर्थ :- वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।

अर्जुन पूछता है – अर्थात देवों की योनियों में जो मनुष्य होते हैं वो अपने सुख भोगकर स्वर्ग से भी लौट आते हैं?
कृष्ण कहते हैं – हाँ! और मनुष्य की योनि प्राप्त होने पर फिर कर्म करते हैं और इस तरह सदैव जन्म मृत्यु का कष्ट भोगते रहते हैं।

अर्जुन पूछता है – हे मधुसूदन! क्या कोई ऐसा स्थान नहीं, जहाँ से लौटकर आना न पड़े और जन्म मरण का ये चक्कर समाप्त हो जाये?

कृष्ण बताते हैं – ऐसा स्थान केवल परम धाम है अर्थात मेरा धाम। जहाँ पहुँचने के बाद किसी को लौटकर नहीं आना पड़ता, इसी को मोक्ष कहते हैं।  
जय श्री राम जी.
यज्ञव्रत अवस्थी